Destinations भारत नई दिल्ली दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन

दराह हज़रत निज़ामुद्दीन.

नई दिल्ली भारत 28° N · 77° E

खिलजी राजकुमार द्वारा 1315-1325 के बीच निर्मित यह मस्जिद दिल्ली की सबसे पुरानी सक्रिय मस्जिदों में से है, जो निज़ामुद्दीन दरगाह के रूहानी परिसर में आज भी अपनी पहचान कायम रखे हुए है।

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दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन
दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन · नई दिल्ली
Time needed
30-60 मिनट (पूरे परिसर के लिए अधिक)
Entry
नि:शुल्क
Access
सीमित
Best season
अक्टूबर से मार्च (सुहावना मौसम)
परिचय

जिस राजकुमार ने इस मस्जिद को बनवाया, इतिहास ने उसे मिटा दिया, लेकिन यह मस्जिद आज भी खड़ी है। नई दिल्ली की निज़ामुद्दीन बस्ती में स्थित 'जमात खाना मस्जिद' सात सदियों से इबादत का गवाह है। इसके संरक्षक का जीवन तो इसके निर्माण के एक दशक बाद ही समाप्त हो गया, लेकिन यह इमारत आज भी उसी शिद्दत से काम कर रही है। यहाँ किसी खंडहर या संग्रहालय की तलाश में न आएं, बल्कि उस जीवित वास्तुकला को देखने आएं, जहाँ खिलजी काल की ईंटें आज भी दिन में पांच बार सजदे में झुकती हैं।

इतिहासकार इसे सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल, यानी 1315 से 1325 ईस्वी के बीच का मानते हैं। निज़ामुद्दीन दरगाह के परिसर में स्थित यह मस्जिद सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार, अमीर खुसरो की कब्र और मुग़लकालीन मकबरों के बीच बसी है। यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक जीवित बस्ती है, जहाँ जीवन और मृत्यु का दायरा कुछ ही मीटर में सिमटा हुआ है।

दिल्ली की जामा मस्जिद या कुतुब परिसर की विशाल इमारतों के विपरीत, जमात खाना मस्जिद में एक अनूठी आत्मीयता है। इसके मेहराब इंसानी कद के हिसाब से बने हैं। इसे कभी पर्यटकों के लिए नहीं बनाया गया था, इसीलिए यह दिखावे से दूर है। अगर आप दिल्ली की उस परत को तलाश रहे हैं जो आज भी धड़कती है, तो आपकी शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।

2016 में पूरी हुई पांच साल लंबी संरक्षण प्रक्रिया ने इसके चेहरे से दशकों पुरानी पेंट और सीमेंट की परतें हटा दी हैं। अब इसके नीचे से वही मूल लाल बलुआ पत्थर और नक्काशी बाहर आई है, जिसे लोग दशकों से भूल चुके थे।

01 क्या देखें

केंद्रीय कक्ष और उजागर होता पत्थर

सदियों तक जमात खाना मस्जिद का असली रूप किसी की नज़रों में नहीं था। चूने और सीमेंट की मोटी परतों ने इसके लाल बलुआ पत्थर को पूरी तरह ढंक रखा था, जिससे इबादत करने वालों के लिए यह बस एक सादा सफेद कमरा बनकर रह गई थी। 2014 में शुरू हुए संरक्षण कार्य के दौरान जब इन परतों को हटाया गया, तो मस्जिद का असली शिल्प सामने आया। मेहराब के चारों ओर कुरान की आयतें और कोनों में बनी जटिल ज्यामितीय नक्काशी उभर आई, जहाँ वर्गाकार कमरा गुंबद में बदलता है। मेहराबों पर बने कमल के फूल के नक्काशीदार मोटिफ आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं—1315-1325 के बीच बनी यह मस्जिद अपनी सजावट में उन प्राचीन परंपराओं को समेटे हुए है जो खुद इस इमारत से सदियों पुरानी हैं। इसके तीन हिस्सों में से बीच वाला हिस्सा सबसे भव्य है। मुख्य गुंबद के नीचे खड़े होकर जब आप ऊपर देखते हैं, तो कोनों पर बनी नक्काशी की बारीकियां आपका ध्यान खींच लेती हैं। पूर्व की ओर बनी जालीदार खिड़कियां धूप को छानकर फर्श पर रोशनी की लकीरें बनाती हैं। बाहर की भीड़ और शोर से दूर, यहाँ का ठंडा पत्थर और शांत माहौल आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराता है।

तीन मेहराबों वाला पूर्वी मुख

निज़ामुद्दीन दरगाह की तस्वीरों में अक्सर लोग सफेद संगमरमर को ही देखते हैं, लेकिन इसके बगल में स्थित यह मस्जिद बिल्कुल अलग मिज़ाज की है। भारी लाल बलुआ पत्थर, नुकीले मेहराब और तीन गुंबद, जिनके शीर्ष पर लगे संगमरमर के कलश रोशनी में चमकते हैं। इसकी पूर्वी दीवार ही इसका मुख्य चेहरा है। तीन मेहराबों की यह श्रृंखला एक किले जैसी मजबूती का आभास देती है। ज़्यादातर लोग इसके कोनों पर बनी 'इवान' जैसी संरचनाओं और जालीदार अवरोधों पर ध्यान नहीं देते, जो इसे महज एक दीवार से बदलकर एक गहरे और परतदार स्थापत्य में तब्दील कर देते हैं। मस्जिद को देखने का सबसे अच्छा नज़रिया दरगाह के आंगन से ठीक सामने का है, जहाँ तीनों गुंबदों का क्रम साफ दिखाई देता है। थोड़ा तिरछा होकर देखने पर आपको नक्काशी और जाली का संगम एक ही फ्रेम में मिलेगा, जो सामने से देखने पर अक्सर ओझल हो जाता है।

निज़ामुद्दीन का पूरा सफर: मस्जिद, दरगाह, बावली और कव्वाली

जमात खाना मस्जिद को दरगाह परिसर से अलग करके नहीं देखा जा सकता। निज़ामुद्दीन बस्ती की तंग गलियों से गुजरते हुए, जहाँ गुलाब की पंखुड़ियों और इत्र की महक हवा में घुली रहती है, आप हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के केंद्र में पहुंचते हैं। यहीं पास में अमीर खुसरो की मज़ार है। गुरुवार की शाम मगरीब की नमाज़ के बाद यहाँ होने वाली कव्वाली की गूंज सदियों पुरानी परंपरा को ज़िंदा रखती है। अगर आप वास्तुकला को इत्मीनान से देखना चाहते हैं, तो किसी भी कार्यदिवस की सुबह आएं। लेकिन अगर आप उस रूहानी अनुभव को जीना चाहते हैं जो इस जगह को खास बनाता है, तो गुरुवार की शाम का समय सबसे बेहतर है। निज़ामुद्दीन अर्बन रिन्यूअल इनिशिएटिव द्वारा संचालित 'सैर-ए-निज़ामुद्दीन' हेरिटेज वॉक के ज़रिए आप यहाँ की बावली, जहाँआरा बेगम का मकबरा और चौसठ खंभा जैसी जगहों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। वसंत पंचमी के दौरान पीले फूलों से सजी यह बस्ती एक अलग ही रंग में रंग जाती है।
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03 Visitor logistics.

कैसे पहुँचें

मेट्रो का इस्तेमाल सबसे बेहतर है। वायलेट लाइन पर जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम या जंगपुरा स्टेशन उतरें। वहां से निज़ामुद्दीन बस्ती तक पहुँचने में 10-15 मिनट पैदल चलना होगा। सराय काले खां-निज़ामुद्दीन (पिंक लाइन) भी एक विकल्प है। याद रखें, आखिरी 200-300 मीटर की गलियां इतनी संकरी हैं कि वहां कोई गाड़ी नहीं जा सकती, इसलिए ऑटो या कैब से बस्ती के प्रवेश द्वार तक आएं और बाकी रास्ता पैदल तय करें।

खुलने का समय

दरगाह परिसर सुबह 5:30 बजे से रात 10:00 बजे तक खुला रहता है। गुरुवार को कव्वाली के कारण इसे रात 10:30 बजे तक खोला जाता है। जमात खाना मस्जिद के लिए कोई अलग समय सीमा नहीं है, लेकिन नमाज़ के वक्त अंदर जाने की अनुमति सीमित हो सकती है। उर्स या रमज़ान जैसे त्योहारों के दौरान भीड़ बहुत बढ़ जाती है।

कितना समय लगेगा

अगर सिर्फ मस्जिद देखनी है, तो 20-30 मिनट काफी हैं। लेकिन यदि आप हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह, अमीर खुसरो का मकबरा और बाओली को भी इत्मीनान से देखना चाहते हैं, तो 45 से 75 मिनट का समय लेकर चलें। गुरुवार शाम की कव्वाली का अनुभव लेना हो, तो डेढ़ से दो घंटे का समय रखें।

सुगमता

यह जगह व्हीलचेयर के लिए सुगम नहीं है। बस्ती की गलियां तंग, ऊबड़-खाबड़ और भीड़भाड़ वाली हैं। परिसर में कोई लिफ्ट नहीं है और संरचनाओं के बीच जगह बहुत कम है। अगर आप चलने-फिरने में असमर्थ हैं, तो किसी साथी के साथ आएं और कैब से जितना हो सके प्रवेश द्वार के करीब उतरें।

खर्च

दरगाह में प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क है। कोई टिकट या बुकिंग नहीं है। प्रवेश द्वार पर फूल या चादर बेचने वाले आपको घेर सकते हैं, लेकिन इन्हें खरीदना अनिवार्य नहीं है। किसी को भी प्रवेश शुल्क के नाम पर पैसे न दें।

05 Tips for visitors.

पोशाक और शिष्टाचार

दरगाह एक पवित्र स्थल है, इसलिए शालीन कपड़े पहनें। कंधे और पैर ढके होने चाहिए। पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए सिर ढंकना ज़रूरी है। मस्जिद या मजार के मुख्य हिस्से में जाने से पहले जूते बाहर उतारने होंगे। अगर आप सिर ढंकने के लिए कुछ लाना भूल जाएं, तो आसपास से मामूली दाम में कपड़ा मिल जाएगा।

कैमरा शिष्टाचार

बाहरी आंगन में फोन से फोटो लेना ठीक है, लेकिन मस्जिद के अंदर नमाज़ के दौरान या मजार के करीब फोटोग्राफी बिल्कुल न करें। ट्राइपॉड, ड्रोन या फ्लैश का इस्तेमाल वर्जित है। किसी भी व्यक्ति की तस्वीर लेने से पहले उनसे अनुमति ज़रूर लें।

दलालों से बचें

गलियों में फूल-माला बेचने वाले और खुद को गाइड बताने वाले बहुत सक्रिय हैं। वे आपसे जबरन खरीदारी या दान का दबाव बना सकते हैं। विनम्रता से 'नहीं' कहें और आगे बढ़ जाएं। अपनी कीमती चीज़ें और पर्स भीड़ में संभाल कर रखें।

गुरुवार बनाम अन्य दिन

गुरुवार की शाम कव्वाली के कारण माहौल बेहद खास होता है, लेकिन बहुत भीड़ और शोर होता है। अगर आपको वास्तुकला को गौर से देखना है या पत्थर पर की गई नक्काशी की तस्वीरें लेनी हैं, तो किसी भी दिन सुबह का समय सबसे अच्छा है।

बस्ती का स्वाद

बस्ती के अंदर गालिब कबाब कॉर्नर के सीख कबाब ज़रूर चखें—दो लोगों के लिए यह 400 रुपये के बजट में बेहतरीन है। आबिद निहारी वाला की निहारी भी लाजवाब है। अगर आपको थोड़ा शांत माहौल चाहिए, तो निज़ामुद्दीन ईस्ट की तरफ जाकर 'कैफे टर्टल' में बैठ सकते हैं।

हुमायूं के मकबरे के साथ तालमेल

हुमायूं का मकबरा और सुंदर नर्सरी सड़क के बिल्कुल दूसरी तरफ हैं। पहले दरगाह और मस्जिद का अनुभव लें, बस्ती में खाना खाएं, और फिर इन मुगलकालीन बगीचों की शांति में टहलें—दोनों जगहों का विरोधाभास आपको दिल्ली की असली तस्वीर दिखाएगा।

04 ऐतिहासिक संदर्भ

सात सौ साल, बिना एक दिन भी बंद हुए

दिल्ली में इससे पुरानी मस्जिदें भी हैं और बड़ी भी, लेकिन ऐसी बहुत कम हैं जहाँ चौदहवीं सदी से आज तक लगातार नमाज़ पढ़ी जा रही हो। इस मस्जिद ने खिलजी, तुगलक, मुग़ल और अंग्रेजों के दौर देखे हैं। इसकी निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

इसकी जड़ें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के खानकाह से जुड़ी हैं। 1325 में संत के निधन के बाद, यह स्थान तीर्थ बन गया। मस्जिद को अपने लिए अलग भीड़ जुटाने की ज़रूरत नहीं पड़ी; दरगाह में आने वाले अकीदतमंदों का सैलाब ही इस मस्जिद की रौनक बना रहा।

बदलाव: सतह का रहस्य

दशकों तक इस मस्जिद की असल पहचान पर पेंट की परतों का पहरा था। देखभाल के नाम पर इस पर लेड पेंट और सीमेंट प्लास्टर की बारह परतें चढ़ा दी गई थीं, जिससे इसकी कुरानिक आयतें और ज्यामितीय नक्काशी पूरी तरह छिप गई थी। 2014 में आगा खान ट्रस्ट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने जब इसे खुरचना शुरू किया, तो वे हैरान रह गए। अप्रैल 2016 में जब यह दोबारा खुली, तो यह किसी नई इमारत जैसी नहीं, बल्कि अपनी सात सौ साल पुरानी असली शक्ल में थी।

निरंतरता: इबादत का सफर

दीवारें बदलीं, लेकिन इबादत का सिलसिला कभी नहीं थमा। मुग़ल काल हो, ब्रिटिश दौर या आज का आधुनिक दिल्ली, यहाँ नमाज़ का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। दिलचस्प बात यह है कि बहाली का काम भी नमाज़ियों के बीच ही चला, मस्जिद बंद नहीं की गई। पास में होने वाली कव्वालियां और अमीर खुसरो की यादें इस मस्जिद की हवा में घुली हुई हैं। यह कोई पुरालेख नहीं, यह एक जीवित इबादतगाह है।

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06 Frequently asked.

क्या जमात खाना मस्जिद देखने जाना चाहिए?

बिल्कुल, यह दिल्ली की उन गिनी-चुनी मस्जिदों में से है जो आज भी अपनी मूल भूमिका में सक्रिय हैं। खिलजी काल (1315-1325) में बनी यह इमारत हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के भीतर स्थित है। 2014-2016 के बीच आगा खान ट्रस्ट द्वारा की गई वैज्ञानिक मरम्मत के बाद, इसकी दीवारों से सीमेंट और पेंट की परतों को हटाकर मूल लाल बलुआ पत्थर को फिर से जीवित किया गया है। यहाँ की कुरानी आयतें और कमल की कलियों जैसी नक्काशी आपको सीधे 14वीं सदी के दिल्ली सल्तनत के कारीगरों के हुनर से रूबरू कराती है।

क्या जमात खाना मस्जिद में प्रवेश मुफ्त है?

यहाँ प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क है। कोई टिकट या बुकिंग नहीं होती। दरगाह के गलियारों में कुछ लोग आपको फूल या चादर खरीदने के नाम पर घेर सकते हैं, लेकिन अंदर जाने के लिए किसी भी चीज़ की अनिवार्यता नहीं है। अपनी श्रद्धा से कुछ दान करना चाहें तो अलग बात है, वरना किसी के दबाव में आने की ज़रूरत नहीं है।

यहाँ आने का सबसे सही समय क्या है?

वास्तुकला को गहराई से समझने के लिए सप्ताह के दिनों की सुबह सबसे अच्छी है, जब धूप लाल पत्थरों पर पड़ती है और भीड़ कम होती है। अगर आप सूफी संगीत और कव्वाली की रूहानी फिज़ा महसूस करना चाहते हैं, तो गुरुवार की शाम आएं। हालांकि, तब गलियों में पैर रखने की जगह नहीं होती। वसंत पंचमी के दौरान यहाँ का माहौल पीले रंग और खास कव्वालियों से पूरी तरह बदल जाता है।

दिल्ली के केंद्र से यहाँ तक कैसे पहुँचें?

वायलेट लाइन मेट्रो से जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम या जंगपुरा उतरें और वहां से निज़ामुद्दीन बस्ती की तंग गलियों से होते हुए 10-15 मिनट पैदल चलें। अगर आप ट्रेन से आ रहे हैं, तो पिंक लाइन का सराय काले खां–निज़ामुद्दीन स्टेशन भी पास है। ऑटो या कैब आपको बस्ती के बाहर बाओली गेट रोड तक ही छोड़ पाएगी, आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होगा।

यहाँ कितना समय बिताना चाहिए?

मस्जिद की नक्काशी और पत्थरों को ध्यान से देखने के लिए 20 मिनट काफी हैं, लेकिन दरगाह का पूरा अनुभव लेने के लिए कम से कम एक से डेढ़ घंटा रखें। अमीर खुसरो की मजार, बाओली और आसपास की गलियों में निहारी-कबाब का ज़ायका लेना इस यात्रा का अभिन्न हिस्सा है। समय हो, तो पास ही स्थित हुमायूं का मकबरा और सुंदर नर्सरी भी देख सकते हैं।

यहाँ क्या देखना बिल्कुल न भूलें?

मस्जिद के मुख्य कक्ष में ऊपर देखें, जहाँ कोनों पर बनी 'स्कंच' (squinch) गुंबद के भार को खूबसूरती से संभालती हैं। मेहराबों पर बनी कमल की कलियों की नक्काशी पर गौर करें—यह उस दौर की एक अनोखी शैली है जहाँ इस्लामी योजना के साथ स्थानीय भारतीय शिल्प का मेल दिखता है। इसके अलावा, मुख्य मेहराब के पास बनी जालीदार खिड़कियां वास्तुकला की बारीकी को दर्शाती हैं।

यहाँ के लिए ड्रेस कोड क्या है?

यह एक सक्रिय इबादतगाह है, इसलिए शालीन कपड़े पहनें। पुरुष और महिलाएं, दोनों को अपना सिर ढंकना अनिवार्य है। मस्जिद और दरगाह के अंदर जाने से पहले जूते बाहर उतारने होंगे। अगर आप स्कार्फ या टोपी लाना भूल गए हैं, तो प्रवेश द्वार के पास ही मामूली कीमत पर मिल जाएंगे।

जमात खाना मस्जिद का इतिहास क्या है?

इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र खिज़्र खान ने 1315-1325 के बीच करवाया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह इमारत मूल रूप से हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मकबरे के लिए सोची गई थी, लेकिन पीर ने खुले आंगन में दफन होना पसंद किया। आज यह मस्जिद उस पूरे सूफी परिसर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जो सात सदियों से निरंतर प्रार्थनाओं का केंद्र बना हुआ है।

स्रोत

स्थापत्य विवरण, निर्माण तिथियां (1315–1325 CE), खिज्र खान द्वारा संरक्षण, और वैकल्पिक नाम 'Khilji Mosque'

संरक्षण अभियान का विवरण, पेंट हटाने की प्रक्रिया, बहाली की समयरेखा (2014–2016), और चल रहा काम

द्विभाषी प्रदर्शनी दस्तावेज़ जो 1315–1325 CE / 715–725 AH निर्माण तिथि सीमा की पुष्टि करता है

बहाली रिपोर्टिंग, ज़नाना संरक्षण, और मस्जिद का ऐतिहासिक संदर्भ

प्रारंभिक बहाली रिपोर्टिंग और मस्जिद के बारे में स्थानीय परंपरा जिसे मूल रूप से निज़ामुद्दीन के मकबरे के रूप में माना गया था

व्यापक दरगाह परिसर का इतिहास, दफन संस्कृति, और मुगल-युग के अतिरिक्त निर्माण

विस्तृत स्थापत्य सर्वेक्षण: तीन-बे योजना, मेहराब, स्क्विंच, जालीदार खिड़कियां, इवान उद्घाटन

खुलने का समय (5:30 AM–10 PM), ड्रेस कोड, मुफ्त प्रवेश, और दरगाह पर लिंग पहुंच प्रतिबंध

कमल-कली आभूषण विवरण और इंडो-इस्लामिक स्थापत्य शब्दावली

वर्तमान आगंतुक शिष्टाचार, विक्रेता दबाव की चेतावनी, भोजन की सिफारिशें, और फोटोग्राफी मार्गदर्शन

मकबरे की उत्पत्ति की परंपरा और संत-बनाम-सुल्तान कथा

गुरुवार का कव्वाली अनुभव, संवेदी वातावरण, और मौसमी सत्र विविधताएं

सामुदायिक नेतृत्व वाली हेरिटेज वॉक जिसमें बसंत वॉक, फूड वॉक और इफ्तार वॉक शामिल हैं

गुरुवार शाम का आगंतुक अनुभव और भीड़ की गतिशीलता

निज़ामुद्दीन के पास वायलेट और पिंक लाइनों के लिए वर्तमान मेट्रो लाइन और स्टेशन स्थान

पड़ोस का वातावरण, आस-पास के लैंडमार्क, और स्थानीय भोजन संस्कृति

AKTC सांस्कृतिक प्रोग्रामिंग जिसमें Aalam-e-Khusrau और Jashn-e-Khusrau उत्सव शामिल हैं

हिंदी-भाषा स्रोत जो स्थापत्य विवरण, तीन-बे योजना और कमल-कली रूपांकनों की पुष्टि करता है

आधिकारिक दरगाह जानकारी, कस्टोडियन सेवाएं, और संपर्क विवरण

पड़ोस का चरित्र, बस्ती के विरोधाभास, और स्थानीय वातावरण

मूल्य संदर्भ के साथ आस-पास के रेस्तरां की सिफारिश

बसंत पंचमी उत्सव, पीले रंग की परंपरा, और व्यावसायीकरण की चिंताएं

निज़ामुद्दीन औलिया के मृत्यु वर्ष (1325) की शैक्षणिक पुष्टि

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