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खिलजी राजकुमार द्वारा 1315-1325 के बीच निर्मित यह मस्जिद दिल्ली की सबसे पुरानी सक्रिय मस्जिदों में से है, जो निज़ामुद्दीन दरगाह के रूहानी परिसर में आज भी अपनी पहचान कायम रखे हुए है।
जिस राजकुमार ने इस मस्जिद को बनवाया, इतिहास ने उसे मिटा दिया, लेकिन यह मस्जिद आज भी खड़ी है। नई दिल्ली की निज़ामुद्दीन बस्ती में स्थित 'जमात खाना मस्जिद' सात सदियों से इबादत का गवाह है। इसके संरक्षक का जीवन तो इसके निर्माण के एक दशक बाद ही समाप्त हो गया, लेकिन यह इमारत आज भी उसी शिद्दत से काम कर रही है। यहाँ किसी खंडहर या संग्रहालय की तलाश में न आएं, बल्कि उस जीवित वास्तुकला को देखने आएं, जहाँ खिलजी काल की ईंटें आज भी दिन में पांच बार सजदे में झुकती हैं।
इतिहासकार इसे सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल, यानी 1315 से 1325 ईस्वी के बीच का मानते हैं। निज़ामुद्दीन दरगाह के परिसर में स्थित यह मस्जिद सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार, अमीर खुसरो की कब्र और मुग़लकालीन मकबरों के बीच बसी है। यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक जीवित बस्ती है, जहाँ जीवन और मृत्यु का दायरा कुछ ही मीटर में सिमटा हुआ है।
दिल्ली की जामा मस्जिद या कुतुब परिसर की विशाल इमारतों के विपरीत, जमात खाना मस्जिद में एक अनूठी आत्मीयता है। इसके मेहराब इंसानी कद के हिसाब से बने हैं। इसे कभी पर्यटकों के लिए नहीं बनाया गया था, इसीलिए यह दिखावे से दूर है। अगर आप दिल्ली की उस परत को तलाश रहे हैं जो आज भी धड़कती है, तो आपकी शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।
2016 में पूरी हुई पांच साल लंबी संरक्षण प्रक्रिया ने इसके चेहरे से दशकों पुरानी पेंट और सीमेंट की परतें हटा दी हैं। अब इसके नीचे से वही मूल लाल बलुआ पत्थर और नक्काशी बाहर आई है, जिसे लोग दशकों से भूल चुके थे।
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इतिहास
दिल्ली में इससे पुरानी मस्जिदें भी हैं और बड़ी भी, लेकिन ऐसी बहुत कम हैं जहाँ चौदहवीं सदी से आज तक लगातार नमाज़ पढ़ी जा रही हो। इस मस्जिद ने खिलजी, तुगलक, मुग़ल और अंग्रेजों के दौर देखे हैं। इसकी निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
इसकी जड़ें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के खानकाह से जुड़ी हैं। 1325 में संत के निधन के बाद, यह स्थान तीर्थ बन गया। मस्जिद को अपने लिए अलग भीड़ जुटाने की ज़रूरत नहीं पड़ी; दरगाह में आने वाले अकीदतमंदों का सैलाब ही इस मस्जिद की रौनक बना रहा।
वह मोड़
अलाउद्दीन खिलजी के सबसे बड़े बेटे खिज़र खान ने 1315-1325 के बीच यह मस्जिद बनवाई थी। यह कदम केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि राजनीति भी थी। दिल्ली के सबसे प्रभावशाली सूफी संत के बगल में मस्जिद बनाना, अपनी सत्ता को नैतिक वैधता देने जैसा था। खिज़र खान को डर था कि पिता के बाद तख्तापलट होगा, और हुआ भी वही।
अलाउद्दीन की मौत के बाद, दरबार की राजनीति ने अपने ही राजकुमार को निगल लिया। खिज़र खान कभी सुल्तान नहीं बन पाया और अपने भाई के शासन में मारा गया। इतिहास की किताबों में उसका नाम भले ही धुंधला हो, लेकिन यह मस्जिद आज भी खड़ी है।
विडंबना देखिए, एक बर्बाद राजकुमार का सबसे स्थायी काम वह इबादतगाह है जिसे उसने किसी संत के साये में बनवाया था। सत्ता तो गिर गई, लेकिन यह पत्थर की इमारत सात सदियों बाद भी वहीं मौजूद है।
बिल्कुल, यह दिल्ली की उन गिनी-चुनी मस्जिदों में से है जो आज भी अपनी मूल भूमिका में सक्रिय हैं। खिलजी काल (1315-1325) में बनी यह इमारत हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के भीतर स्थित है। 2014-2016 के बीच आगा खान ट्रस्ट द्वारा की गई वैज्ञानिक मरम्मत के बाद, इसकी दीवारों से सीमेंट और पेंट की परतों को हटाकर मूल लाल बलुआ पत्थर को फिर से जीवित किया गया है। यहाँ की कुरानी आयतें और कमल की कलियों जैसी नक्काशी आपको सीधे 14वीं सदी के दिल्ली सल्तनत के कारीगरों के हुनर से रूबरू कराती है।
यहाँ प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क है। कोई टिकट या बुकिंग नहीं होती। दरगाह के गलियारों में कुछ लोग आपको फूल या चादर खरीदने के नाम पर घेर सकते हैं, लेकिन अंदर जाने के लिए किसी भी चीज़ की अनिवार्यता नहीं है। अपनी श्रद्धा से कुछ दान करना चाहें तो अलग बात है, वरना किसी के दबाव में आने की ज़रूरत नहीं है।
वास्तुकला को गहराई से समझने के लिए सप्ताह के दिनों की सुबह सबसे अच्छी है, जब धूप लाल पत्थरों पर पड़ती है और भीड़ कम होती है। अगर आप सूफी संगीत और कव्वाली की रूहानी फिज़ा महसूस करना चाहते हैं, तो गुरुवार की शाम आएं। हालांकि, तब गलियों में पैर रखने की जगह नहीं होती। वसंत पंचमी के दौरान यहाँ का माहौल पीले रंग और खास कव्वालियों से पूरी तरह बदल जाता है।
वायलेट लाइन मेट्रो से जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम या जंगपुरा उतरें और वहां से निज़ामुद्दीन बस्ती की तंग गलियों से होते हुए 10-15 मिनट पैदल चलें। अगर आप ट्रेन से आ रहे हैं, तो पिंक लाइन का सराय काले खां–निज़ामुद्दीन स्टेशन भी पास है। ऑटो या कैब आपको बस्ती के बाहर बाओली गेट रोड तक ही छोड़ पाएगी, आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होगा।
मस्जिद की नक्काशी और पत्थरों को ध्यान से देखने के लिए 20 मिनट काफी हैं, लेकिन दरगाह का पूरा अनुभव लेने के लिए कम से कम एक से डेढ़ घंटा रखें। अमीर खुसरो की मजार, बाओली और आसपास की गलियों में निहारी-कबाब का ज़ायका लेना इस यात्रा का अभिन्न हिस्सा है। समय हो, तो पास ही स्थित हुमायूं का मकबरा और सुंदर नर्सरी भी देख सकते हैं।
मस्जिद के मुख्य कक्ष में ऊपर देखें, जहाँ कोनों पर बनी 'स्कंच' (squinch) गुंबद के भार को खूबसूरती से संभालती हैं। मेहराबों पर बनी कमल की कलियों की नक्काशी पर गौर करें—यह उस दौर की एक अनोखी शैली है जहाँ इस्लामी योजना के साथ स्थानीय भारतीय शिल्प का मेल दिखता है। इसके अलावा, मुख्य मेहराब के पास बनी जालीदार खिड़कियां वास्तुकला की बारीकी को दर्शाती हैं।
यह एक सक्रिय इबादतगाह है, इसलिए शालीन कपड़े पहनें। पुरुष और महिलाएं, दोनों को अपना सिर ढंकना अनिवार्य है। मस्जिद और दरगाह के अंदर जाने से पहले जूते बाहर उतारने होंगे। अगर आप स्कार्फ या टोपी लाना भूल गए हैं, तो प्रवेश द्वार के पास ही मामूली कीमत पर मिल जाएंगे।
इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र खिज़्र खान ने 1315-1325 के बीच करवाया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह इमारत मूल रूप से हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मकबरे के लिए सोची गई थी, लेकिन पीर ने खुले आंगन में दफन होना पसंद किया। आज यह मस्जिद उस पूरे सूफी परिसर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जो सात सदियों से निरंतर प्रार्थनाओं का केंद्र बना हुआ है।
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