एक परिचय।
Audiala संपादकीय टीम द्वारा ऐतिहासिक अभिलेखों, स्थापत्य अभिलेखागारों और स्थानीय विशेषज्ञता से शोधित।
एएक लौ जो ठीक पचास साल तक जलती रही, अचानक बुझ कैसे गई? यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सैन्य अनुष्ठान था। नई दिल्ली की इंडिया गेट के नीचे 26 जनवरी 1972 को गणतंत्र दिवस के मौके पर 'अमर जवान ज्योति' प्रज्वलित की गई थी, लेकिन जनवरी 2022 की एक शाम इसे मशाल के जरिए 400 मीटर दूर स्थित नए युद्ध स्मारक में स्थानांतरित कर दिया गया। आज भी इंडिया गेट के मेहराब के नीचे वह संगमरमर का चबूतरा मौजूद है—उल्टा रखा राइफल, उस पर टिकी फौजी टोपी और चार खाली कलश। यहाँ आकर आप उस जगह को देख सकते हैं जहाँ आधी सदी तक देश ने अपने शहीदों को नमन किया, और यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि इस लौ का यहाँ से चले जाना, इसके होने से कहीं ज्यादा गहरी कहानी क्यों कहता है।
इंडिया गेट के नीचे खड़े होकर आप उसी स्मारक को देखते हैं जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1972 में स्थापित किया था। एक L1A1 राइफल जमीन की तरफ झुकी हुई है और उस पर फौजी हेलमेट रखा है। चबूतरे के चारों कोनों पर ईंट के रंग के कलश हैं—जो कभी हर 36 घंटे में बदले जाने वाले एलपीजी सिलेंडरों से दमकते थे, लेकिन अब गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस को छोड़कर ये ठंडे और बुझे हुए रहते हैं।
ऊपर बना मेहराब पूरी तरह से एक अलग दौर की दास्तान है। सर एडविन लुटियंस ने इसे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए डिजाइन किया था और 12 फरवरी 1931 को लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया था। इसकी बलुआ पत्थर की दीवारों पर खुदे 13,316 नाम उन सैनिकों के हैं जिन्होंने 1914 से 1921 के बीच प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे आंग्ल-अफगान युद्ध में ब्रिटिश ताज के लिए अपनी जान दी थी, न कि भारतीय स्वतंत्रता के लिए।
वह ज्योति अब 400 मीटर पूर्व में स्थित 'नेशनल वॉर मेमोरियल' में जलती है, जो एक गोलाकार परिसर है। यहाँ 25,942 नाम दर्ज हैं। हर शाम सूर्यास्त के समय, किसी शहीद के परिवार का सदस्य—जिन्हें सरकार के खर्च पर दिल्ली बुलाया जाता है—लौ के पास पुष्पांजलि अर्पित करता है। रविवार के दिन यहाँ होने वाले 'चेंज ऑफ गार्ड' समारोह में बजती रेजिमेंटल धुनें लोगों का मन मोह लेती हैं।
Watch | Amar Jawan Jyoti Flame At India Gate Being Merged With The National War Memorial Flame
Mojo Story01 क्या देखें.
इंडिया गेट और स्मृति-चिह्न
इंडिया गेट की 42 मीटर ऊंची संरचना किसी दस-मंजिला इमारत जैसी विशाल है। भरतपुर के लाल बलुआ पत्थर से बना यह स्मारक सुबह की पहली किरण में सुनहरी और ढलती शाम में गहरे गेरुए रंग का दिखता है। 1931 में एडविन लुटियंस ने इसे प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे आंग्ल-अफगान युद्ध में शहीद हुए 74,187 सैनिकों की याद में बनाया था। इसकी दीवारों पर 13,300 सैनिकों के नाम रेजिमेंट के अनुसार खुदे हुए हैं। ज्यादातर सैलानी बस इसके नीचे से गुजर जाते हैं, लेकिन रुककर उन नामों को गौर से देखिए—सिख, मुस्लिम, हिंदू और ब्रिटिश नाम एक साथ लिखे हैं। यही उस दौर की फौज की हकीकत थी।
मेहराब के ठीक नीचे अमर जवान ज्योति का स्मृति-चिह्न है: एक काला संगमरमर का चबूतरा, जिस पर बैरल नीचे की ओर और बट ऊपर की ओर रखी L1A1 राइफल है, और उसके ऊपर एक स्टील का हेलमेट। चारों तरफ सुनहरे अक्षरों में 'अमर जवान' लिखा है। 26 जनवरी 1972 से 21 जनवरी 2022 तक यहाँ जलने वाली लौ अब 400 मीटर दूर नेशनल वॉर मेमोरियल में विलीन हो चुकी है। अब यहाँ आग नहीं है, लेकिन वह खाली जगह एक अजीब सी खामोशी और गहराई लिए हुए है। एक बारीक बात जो अक्सर छूट जाती है: मेहराब के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक पत्थर का कटोरा बना है, जिसे लुटियंस ने कभी औपचारिक मौकों पर आग जलाने के लिए डिजाइन किया था, जो आज भी वहां मौजूद है पर शायद ही किसी की नजर वहां तक जाती है।
नेशनल वॉर मेमोरियल — जहाँ अब ज्योति जलती है
इंडिया गेट से 400 मीटर दक्षिण में नेशनल वॉर मेमोरियल स्थित है, जहाँ आज वह लौ प्रज्ज्वलित है। चेन्नई के वास्तुकार योगेश चंद्रहासन द्वारा डिजाइन किया गया यह स्मारक जमीन से बमुश्किल 1.5 मीटर ऊंचा है, ताकि यह इंडिया गेट की भव्यता को न दबाए। यहाँ चार चक्र हैं—रक्षक, त्याग, वीरता और अमर चक्र। त्याग चक्र की ग्रेनाइट दीवारों पर स्वतंत्रता के बाद शहीद हुए 25,942 सैनिकों के नाम दर्ज हैं।
यहाँ की सबसे खास जगह 'वीरता चक्र' है, जो जमीन के नीचे एक गैलरी है। यहाँ राम सुतार द्वारा बनाई गई छह विशाल कांस्य प्रतिमाएं हैं, जो लोंगेवाला, रेजांग ला और सियाचिन जैसे युद्धों की दास्तां कहती हैं। ऊपर की गर्मी से दूर, यहाँ का वातावरण ठंडा और शांत है। आप करीब जाकर उन सैनिकों के चेहरों के भाव महसूस कर सकते हैं। बीचों-बीच स्थित 15 मीटर का ग्रेनाइट ओबिलिस्क 'अमर चक्र' है, जहाँ अखंड ज्योति जलती है। शाम ढलते ही यहाँ आने की कोशिश करें; जब दिल्ली का आसमान धुंधला होता है, तो लौ का उजाला और भी तेज लगता है। शाम की 'रिट्रीट सेरेमनी' यहाँ का सबसे भावुक क्षण होता है, जब झंडे उतारे जाते हैं और खामोशी में हजारों नाम गूंजने लगते हैं।
कैनोपी से ज्योति तक: एक पूरा सफर
कर्तव्य पथ पर चलते हुए आप भारत के इतिहास को एक सीधी रेखा में देख सकते हैं। इंडिया गेट के पीछे बने उस कैनोपी से शुरुआत करें, जहां कभी किंग जॉर्ज पंचम की प्रतिमा थी, और अब वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 28 फुट ऊंची ग्रेनाइट प्रतिमा है—औपनिवेशिक सत्ता की जगह स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान। इंडिया गेट की तरफ बढ़ते हुए मेहराब पर लिखे रोमन अंकों (MCMXIV और MCMXIX) पर गौर करें, जिसे लोग अक्सर सिर्फ नक्काशी समझ लेते हैं।
मेहराब और खाली स्मृति-चिह्न से होते हुए नेशनल वॉर मेमोरियल तक का यह रास्ता महज एक किलोमीटर का है, लेकिन यह एक सदी के संघर्ष और बदलाव को बयां करता है। अंत में 'परम योद्धा स्थल' जरूर जाएं, जहां 21 परमवीर चक्र विजेताओं की कांस्य प्रतिमाएं हैं। हर प्रतिमा के साथ उनके अदम्य साहस का विवरण लिखा है। इसे पढ़ने में समय लगता है, लेकिन रुककर उन नामों को जरूर पढ़ें। यह जगह आपको एक अलग ही अहसास कराएगी।
अमर जवान ज्योति. को देखें और जानें
अमर जवान ज्योति की योजना बनाएँ और सुनें Audiala के साथ।
जेब में ऑडियो गाइड, ब्राउज़र में यात्रा-योजना। ठीक उसी तरह बना है जैसे आप असल में घूमते हैं।
03 Visitor logistics.
एक अच्छे सफर का व्यावहारिक ढाँचा — संक्षेप में रखा गया।
कैसे पहुँचें
यहाँ पहुँचने का सबसे सही तरीका सेंट्रल सेक्रेटेरिएट मेट्रो स्टेशन (येलो/वॉयलेट लाइन) है। यहाँ से कर्तव्य पथ होते हुए 25 मिनट की पैदल दूरी है, जो सर्दियों में तो सुखद लगती है, लेकिन दिल्ली की 45 डिग्री वाली गर्मी में काफी भारी पड़ सकती है। खान मार्केट स्टेशन (वॉयलेट लाइन) यहाँ से करीब 1.7 किमी दूर है। स्टेशन से ओला या उबर लेना बेहतर है (₹40–80), बजाय इसके कि आप ऑटो वालों से मोलभाव में समय खराब करें। अगर अपनी गाड़ी से आ रहे हैं, तो हेक्सागोन रोड या पांडारा रोड की पार्किंग का उपयोग करें और स्मारक तक 500 मीटर से 1 किमी पैदल चलने के लिए तैयार रहें।
खुलने का समय
इंडिया गेट का आर्का और उसके आसपास का इलाका 24 घंटे खुला रहता है और प्रवेश पूरी तरह से नि:शुल्क है। नेशनल वॉर मेमोरियल — जहाँ अब अमर जवान ज्योति प्रज्वलित रहती है — मुख्य द्वार से 400 मीटर पीछे है। यह अप्रैल से अक्टूबर तक सुबह 9 से रात 8 बजे तक और नवंबर से मार्च तक सुबह 9 से शाम 7:30 बजे तक खुला रहता है। 2026 के अनुसार, गणतंत्र दिवस सप्ताह (23–26 जनवरी) के दौरान यहाँ आने से बचें, क्योंकि कर्तव्य पथ परेड की तैयारियों के कारण पूरी तरह बंद रहता है।
कितना समय लगेगा
अगर आप सिर्फ सेल्फी लेकर निकलना चाहते हैं, तो 20–30 मिनट काफी हैं। लेकिन यदि आप इत्मीनान से शहीदों के नाम पढ़ना चाहते हैं और वॉर मेमोरियल के चारों घेरों को देखना चाहते हैं, तो 1.5 से 2 घंटे रखें। शाम के समय मेमोरियल का रिट्रीट समारोह और कर्तव्य पथ की रोशनी का आनंद लेने के लिए 2.5–3 घंटे का समय निकालना सबसे अच्छा है।
सुविधाएँ
2022 के नवीनीकरण के बाद कर्तव्य पथ पर लाल ग्रेनाइट के समतल रास्ते बनाए गए हैं, जिससे यहाँ चलना बहुत आसान हो गया है। नेशनल वॉर मेमोरियल पूरी तरह से व्हीलचेयर के अनुकूल है; प्रवेश द्वार पर अनुरोध करने पर व्हीलचेयर मिल जाती है। मेमोरियल के अंदर और कर्तव्य पथ के नीचे बने अंडरग्राउंड एरिया में सुलभ शौचालय की सुविधा भी मौजूद है।
खर्च
यहाँ सब कुछ मुफ्त है—इंडिया गेट, नेशनल वॉर मेमोरियल और कर्तव्य पथ का पूरा परिसर। किसी टिकट या बुकिंग की जरूरत नहीं है। बस एक बात का ध्यान रखें, विदेशी नागरिकों से सुरक्षा जाँच के समय आईडी माँगी जा सकती है, इसलिए अपना पासपोर्ट साथ रखें। कर्तव्य पथ की नहर में बोटिंग का आनंद लेना हो, तो 15 मिनट के लिए ₹50 और 30 मिनट के लिए ₹100 का शुल्क देकर दोपहर 2 से रात 9 बजे तक सवारी कर सकते हैं।
04 Tips for visitors.
छोटी-छोटी बातें जो पूरा दिन बदल देती हैं।
ज्योति का स्थान
अमर जवान ज्योति अब इंडिया गेट के नीचे नहीं जलती। जनवरी 2022 में इसे 400 मीटर दूर नेशनल वॉर मेमोरियल की ज्योति में विलीन कर दिया गया। इंडिया गेट के नीचे राइफल और हेलमेट तो है, लेकिन वह लौ अब वहाँ नहीं है। इसलिए, सिर्फ इंडिया गेट देखकर न लौटें, 5 मिनट पैदल चलकर वॉर मेमोरियल जरूर जाएँ।
ड्रोन वर्जित
इंडिया गेट राष्ट्रपति भवन के पास 'रेड ज़ोन' में आता है। यहाँ ड्रोन उड़ाना पूरी तरह वर्जित है। पकड़े जाने पर भारी जुर्माना और जेल हो सकती है। सामान्य कैमरा या फोन से फोटो खींचने में कोई दिक्कत नहीं है, बस ड्रोन का ख्याल बिल्कुल न लाएं।
पिकनिक पर रोक
जुलाई 2025 के आदेश के अनुसार, इंडिया गेट के लॉन पर पिकनिक मनाना, खाना-पीना, मैट बिछाना या बैग ले जाना मना है। पुराने दिनों की तरह यहाँ बैठकर खाना खाने की उम्मीद न रखें। इसके बजाय कर्तव्य पथ के नीचे बने शानदार एयर-कंडीशन्ड फूड कोर्ट में जाएँ, जहाँ ₹80–200 की रेंज में देश भर के अलग-अलग राज्यों के व्यंजन मिलते हैं।
रिट्रीट समारोह
शाम को सूर्यास्त के समय नेशनल वॉर मेमोरियल में 'रिट्रीट समारोह' होता है। मिलिट्री बैंड की धुन और गार्ड बदलने की रस्म देखना एक अलग अनुभव है। रविवार को यह और भी भव्य हो जाता है। भीड़ से बचने के लिए 30 मिनट पहले पहुँचें और शांत भाव से देखें।
पांडारा रोड का खाना
यहाँ से 5 मिनट की दूरी पर पांडारा रोड है, जो दिल्ली के जायके के लिए मशहूर है। 'गुलाटी' का बटर चिकन या 'पिंडी' (1948 से) की दाल मखनी का स्वाद जरूर लें। अंत में 'कृष्णा दी कुल्फी' खाना न भूलें। कनाट प्लेस के महंगे टूरिस्ट ट्रैप्स से बेहतर है कि आप यहाँ के स्थानीय पसंदीदा ठिकानों पर जाएँ।
धोखाधड़ी से बचें
मेट्रो स्टेशन के पास ऑटो वाले आपसे कह सकते हैं कि 'इंडिया गेट आज बंद है', ताकि वे आपको कहीं और ले जा सकें। उनकी बातों में न आएं, इंडिया गेट पैदल यात्रियों के लिए कभी बंद नहीं होता। स्टेशन से सीधे ओला-उबर लें या पैदल चलें, कर्तव्य पथ का रास्ता पैदल तय करना ही असली अनुभव है।
कहाँ खाएं
इन्हें चखे बिना न जाएं
MTDC Maharashtra Food Stall N-8
quick biteऑर्डर करें: क्षेत्रीय महाराष्ट्र व्यंजन — मिसल पाव, भाकरी और स्थानीय करी देखें जो राज्य के प्रामाणिक घरेलू भोजन को दर्शाते हैं।
महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित, यह स्टॉल इंडिया गेट पर ही वास्तविक क्षेत्रीय घरेलू भोजन लाता है। यह वह जगह है जहां स्थानीय लोग पर्यटक मार्कअप के बिना प्रामाणिक महाराष्ट्र व्यंजन प्राप्त करते हैं।
HYDERABADI CUISINE telengana tourism developement corporation
quick biteऑर्डर करें: हैदराबादी बिरयानी, हलीम और निहारी — मसालेदार चावल के व्यंजन और धीमी आंच पर पकाई गई मांस की करी, जिसके लिए हैदराबाद प्रसिद्ध है।
एक आधिकारिक तेलंगाना सरकारी फूड स्टॉल जो असली स्वाद परोसता है — हैदराबादी खाना, मुगल और दक्षिण भारतीय मसालों के अपने सिग्नेचर मिश्रण के साथ। स्मारक के इतने करीब प्रामाणिक तेलंगाना भोजन मिलना दुर्लभ है।
भोजन सुझाव
- check इंडिया गेट के स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के पास शाम के समय जाना सबसे अच्छा है जब भीड़ जमा होती है — यह वह समय है जब ऊर्जा चरम पर होती है और भोजन सबसे ताजा होता है।
- check इंडिया गेट पर दो सत्यापित रेस्तरां सरकारी फूड स्टॉल हैं जो मध्यम कीमतों पर प्रामाणिक क्षेत्रीय व्यंजन पेश करते हैं — स्मारक परिसर छोड़े बिना एक त्वरित, प्रामाणिक भोजन के लिए एकदम सही।
- check इंडिया गेट पर स्ट्रीट फूड (गोल गप्पे, चाट, चुस्की) की कीमत आमतौर पर ₹20–80 होती है और इसे भीड़ के साथ खड़े होकर या बेंच पर बैठकर खाना सबसे अच्छा है — यह अनुभव का हिस्सा है।
- check यदि आप बैठकर पूरा भोजन करना चाहते हैं, तो पंडारा रोड मार्केट 10 मिनट की पैदल दूरी पर है और वहां प्रसिद्ध बटर चिकन रेस्तरां हैं जो बहुत देर तक (रात 2-3 बजे तक) खुले रहते हैं।
- check खान मार्केट, 15 मिनट की दूरी पर, अपस्केल कैफे और रेस्तरां प्रदान करता है — स्मारक क्षेत्र से दूर इत्मीनान से दोपहर के भोजन या कॉफी ब्रेक के लिए बेहतर है।
रेस्तरां डेटा Google द्वारा प्रदान
05 A history of reinvention.
किसी और के मेहराब के नीचे जलती लौ
हर युद्ध स्मारक के दो इतिहास होते हैं: वह युद्ध जिसे वह याद करता है, और वह राजनीति जिसने उसे वहाँ खड़ा किया। इंडिया गेट पर ये इतिहास अलग-अलग सदियों और अलग-अलग विचारधाराओं के हैं।
मेहराब ब्रिटिश ताज के लिए बना था, और ज्योति गणतंत्र के सैनिकों के लिए। पचास वर्षों तक ये दोनों—औपनिवेशिक स्मारक और उत्तर-औपनिवेशिक गौरव—साथ-साथ रहे, जब तक कि 2022 में वह लौ वहाँ से हटा नहीं ली गई।
इंदिरा गांधी और वह महीना जिसने इंडिया गेट को बदल दिया
ज्यादातर पर्यटक सोचते हैं कि इंडिया गेट और अमर जवान ज्योति एक ही समय के स्मारक हैं। लेकिन तारीखें अलग कहानी कहती हैं। मेहराब 1931 में बना, और ज्योति 41 साल बाद 1972 में आई। पत्थरों पर खुदे नाम प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों के हैं, जिनका 1971 के भारत-पाक युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है, जिसके लिए यह ज्योति जलाई गई थी।
1971 की निर्णायक जीत के बाद इंदिरा गांधी ने एक महीने से भी कम समय में इस स्मारक को बनाने का आदेश दिया। 13 दिन का यह युद्ध 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के आत्मसमर्पण के साथ खत्म हुआ—जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य समर्पण था। इंदिरा गांधी के लिए यह जीत स्वतंत्र भारत की सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उनकी साख पक्की करने वाली थी। 1968 में उन्होंने किंग जॉर्ज पंचम की मूर्ति को वहां से हटा दिया था, और ब्रिटिश मेहराब के नीचे भारतीय शहीदों की ज्योति जलाना एक प्रतीकात्मक कब्जा था।
यह जानने के बाद यहाँ का दृश्य बदल जाता है। एक ही जगह पर तीन स्मृतियाँ जुड़ी हैं: 1931 का ब्रिटिश साम्राज्य का स्मारक, 1972 का भारतीय गणतंत्र का दावा, और 2022 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ग्रेनाइट मूर्ति का अनावरण। दिल्ली में शायद ही कोई और जगह हो जहाँ इतने कम दायरे में इतने सारे विरोधाभासी दावे मौजूद हों।
वह शख्स जिसने चालीस साल तक लौ को बुझने नहीं दिया
विलय या बुझना? एक ऐसा विवाद जो खत्म नहीं हो रहा
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06 अक्सर पूछे जाने वाले।
अमर जवान ज्योति के बारे में यात्री जो सवाल हमें सबसे ज़्यादा भेजते हैं।
क्या अमर जवान ज्योति अभी भी इंडिया गेट पर है?
नहीं, अमर जवान ज्योति की लौ अब इंडिया गेट पर नहीं है। 21 जनवरी 2022 को, जो लौ 50 वर्षों से लगातार जल रही थी, उसे औपचारिक रूप से इंडिया गेट से 400 मीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित 'राष्ट्रीय समर स्मारक' (National War Memorial) में स्थानांतरित कर दिया गया। इंडिया गेट के मेहराब के नीचे काले संगमरमर की वह छतरी आज भी मौजूद है, लेकिन वहां अब आग नहीं जलती। जीवित लौ देखने के लिए आपको राष्ट्रीय समर स्मारक तक जाना होगा।
क्या अमर जवान ज्योति को मुफ्त में देखा जा सकता है?
हाँ, दोनों जगह जाना पूरी तरह से निःशुल्क है। इंडिया गेट और उसके आसपास के लॉन 24 घंटे खुले रहते हैं। राष्ट्रीय समर स्मारक, जहाँ अब लौ जलती है, वहां भी प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। यह सर्दियों में सुबह 9 से शाम 7:30 बजे तक और गर्मियों में रात 8 बजे तक खुला रहता है। किसी भी स्थान के लिए टिकट या बुकिंग की आवश्यकता नहीं है।
नई दिल्ली से इंडिया गेट कैसे पहुँचें?
सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन 'सेंट्रल सेक्रेटेरिएट' (येलो और वॉयलेट लाइन) है, जो यहाँ से लगभग 2 किमी दूर है। कर्तव्य पथ पर पैदल चलने में आपको 25 से 35 मिनट लग सकते हैं। गर्मी होने पर स्टेशन से ऑटो-रिक्शा ले लें (किराया ₹40-80 के बीच)। खान मार्केट मेट्रो स्टेशन (वॉयलेट लाइन) भी करीब 1.7 किमी दूर है। ध्यान रहे, कर्तव्य पथ के कुछ हिस्सों तक निजी गाड़ियाँ नहीं पहुँचतीं, इसलिए पार्किंग से आपको करीब 500 मीटर पैदल चलना होगा।
इंडिया गेट और अमर जवान ज्योति जाने का सही समय क्या है?
सूर्यास्त का समय सबसे बेहतरीन होता है। सुनहरी रोशनी में भरतपुर के बलुआ पत्थर गहरे एम्बर रंग के हो जाते हैं, और इसी समय राष्ट्रीय समर स्मारक पर 'रिट्रीट सेरेमनी' होती है। घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे अच्छा है (तापमान 15°C से 25°C के बीच)। मई-जून की चिलचिलाती गर्मी और 26 जनवरी के आसपास की भारी भीड़ से बचें।
इंडिया गेट और राष्ट्रीय समर स्मारक में कितना समय लगेगा?
दोनों जगहों को ठीक से समझने के लिए 2 से 3 घंटे का समय निकालें। इंडिया गेट के मेहराब को देखने में 20 मिनट काफी हैं, लेकिन असली अनुभव 400 मीटर चलकर राष्ट्रीय समर स्मारक तक जाने में है। वहाँ चार चक्रों को देखें, ग्रेनाइट की दीवारों पर लिखे 25,942 शहीदों के नाम पढ़ें और सूर्यास्त के समय की सेरेमनी देखें। 'वीरता चक्र' की भूमिगत आर्ट गैलरी के लिए कम से कम 20 मिनट अलग रखें।
इंडिया गेट पर क्या देखना नहीं भूलना चाहिए?
राष्ट्रीय समर स्मारक पर होने वाली 'रिट्रीट सेरेमनी' को बिल्कुल न छोड़ें, जिसके बारे में ज्यादातर सैलानी नहीं जानते। हर शाम यहाँ झंडा उतारा जाता है और किसी शहीद के परिजन द्वारा पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। साथ ही, वीरता चक्र की भूमिगत गैलरी में बनी कांस्य की बड़ी पेंटिंग्स देखें, जो अक्सर खाली रहती हैं। रविवार की शाम को मिलिट्री बैंड के साथ होने वाली 'चेंज ऑफ गार्ड' सेरेमनी भी प्रभावशाली होती है।
क्या इंडिया गेट पर पिकनिक की अनुमति है?
नहीं, अब यह मुमकिन नहीं है। जुलाई 2025 के NDMC आदेश के बाद से इंडिया गेट के लॉन पर पिकनिक मनाना, खाना-पीना या चटाई बिछाकर बैठना प्रतिबंधित कर दिया गया है। दशकों पुरानी यह परंपरा अब खत्म हो चुकी है। खाने के लिए आप कर्तव्य पथ पर बने नए अंडरग्राउंड फूड कोर्ट में जा सकते हैं, जहाँ ₹80 से ₹200 में आपको भारत के विभिन्न राज्यों के व्यंजन मिल जाएंगे।
इंडिया गेट और राष्ट्रीय समर स्मारक में क्या अंतर है?
ये दोनों स्मारक 88 साल के अंतराल पर अलग-अलग उद्देश्यों से बने हैं। 1931 में बना इंडिया गेट प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के 74,187 शहीदों की याद में बना है। वहीं, 2019 में बना राष्ट्रीय समर स्मारक 1947 के बाद के युद्धों में शहीद हुए 25,942 भारतीय सैनिकों को समर्पित है। 2022 से, अमर ज्योति केवल राष्ट्रीय समर स्मारक में जल रही है।
सत्यापित, और दिखाया गया।
Audiala संपादकीय टीम द्वारा ऐतिहासिक अभिलेखों, स्थापत्य अभिलेखागारों और स्थानीय विशेषज्ञता से शोधित और लिखित।
स्मारक का इतिहास, 1972 का उद्घाटन, लौ ईंधन प्रणाली, 2022 के विलय का विवरण
औपनिवेशिक उत्पत्ति, लुटियंस डिजाइन, अंकित नाम, आयाम, प्रथम विश्व युद्ध का स्मरणोत्सव
NWM वास्तुकला, चार चक्रों का डिजाइन, उद्घाटन की तारीख, स्वतंत्रता के बाद के सैनिकों की संख्या
ऐतिहासिक संदर्भ, 1931 का उद्घाटन, सैनिकों के स्मरणोत्सव की संख्या
लौ के विलय का राजनीतिक संदर्भ, औपनिवेशिक प्रतीकवाद का विश्लेषण
इंडिया गेट के शीर्ष पर लुटियंस का मूल फायर बाउल डिजाइन
कैनोपी का इतिहास, जॉर्ज पंचम की मूर्ति को हटाना, नेताजी बोस की प्रतिमा की स्थापना
वास्तुकला संबंधी विवरण, संकेंद्रित वृत्त डिजाइन, धर्मचक्र अवधारणा
खुलने का समय, अपनी यात्रा की योजना बनाएं, दैनिक समारोह, गार्ड रोटेशन का विवरण
विपक्ष की प्रतिक्रियाएं, पूर्व सैनिकों के दृष्टिकोण, 'स्मृति मिटाने' का चित्रण
विलय समारोह का विवरण, एयर मार्शल बलभद्र राधा कृष्ण की भूमिका
एलपीजी सिलेंडर प्रणाली, पीएनजी संक्रमण, चंदर सिंह बिष्ट के रखरखाव का विवरण
जुलाई 2025 का NDMC आदेश, लॉन पर पिकनिक, भोजन और मैट पर प्रतिबंध
लॉन पर प्रतिबंध का सांस्कृतिक प्रभाव, स्थानीय प्रतिक्रियाएं, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
वर्तमान खुलने का समय, आगंतुक रसद, शाम के लाइट शो का समय
मेट्रो स्टेशन की दूरी, परिवहन के विकल्प, पैदल चलने का समय
2022 के नवीनीकरण का विवरण, भूमिगत फूड कोर्ट, शौचालय की सुविधा
राजनीतिक बहस का सारांश, लौ पर कांग्रेस बनाम भाजपा के रुख
विजय मशाल रिले परंपरा, NWM में वार्षिक समारोह का विवरण
दैनिक परिजन पुष्पांजलि कार्यक्रम, राज्य द्वारा वित्त पोषित पारिवारिक यात्रा
परम योद्धा स्थल कांस्य प्रतिमाएं, आगंतुक जानकारी
प्रथम-व्यक्ति आगंतुक अनुभव, संवेदी विवरण, समारोह का वर्णन
नींव की तारीख (10 फरवरी 1921), ड्यूक ऑफ कनॉट समारोह
आस-पास के भोजन विकल्प, गुलाटी, पिंडी, रेस्तरां की सिफारिशें
विपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं, 'इतिहास मिटाने' का चित्रण
लौ के हस्तांतरण पर पूर्व सैनिकों के विभाजित दृष्टिकोण
खाली कैनोपी का इतिहास, जॉर्ज पंचम की प्रतिमा को हटाने का संदर्भ
टेट्रापिलॉन डिजाइन विवरण, भरतपुर बलुआ पत्थर, वास्तुशिल्प विश्लेषण
वास्तुकार योगेश चंद्रहासन का डिजाइन इरादा, संकेंद्रित वृत्त अवधारणा
2025 समारोह में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल, सीमा पार स्मरणोत्सव
राजपथ से कर्तव्य पथ का नाम बदलना, पुनर्विकास का विवरण, नेताजी की प्रतिमा
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