प्राचीन ढूंढाड़
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3री शताब्दी ईसा पूर्व
बैराट में अशोक के वचन
भविष्य के जयपुर के ठीक उत्तर में, बैराट के पास शिला पर उकेरे गए बौद्ध आदेश साबित करते हैं कि यह इलाका पहले से ही एक बड़े राजनीतिक संसार का हिस्सा था। यह पत्थर धर्म और प्रशासन की बात उस समय करता है जब राजपूतों ने अभी इस भूमि पर दावा भी नहीं किया था। व्यवस्था की यह शुरुआती छाप बाद के शासकों में भी गूंजती रही, जिन्होंने अव्यवस्थित भूभाग पर तर्क और अनुशासन थोपने की कोशिश की।
कछवाहा उदय
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लगभग 1128
कछवाहों ने ढूंढाड़ पर कब्ज़ा किया
दुल्हा राय के योद्धाओं ने मीणा सरदारों से सत्ता छीनकर आमेर को अपनी राजधानी बनाया। यह बदलाव कछवाहा शासन के छह शताब्दियों लंबे दौर की शुरुआत था। जो शुरुआत में पहाड़ी किले के लिए शक्ति-संघर्ष था, वही आगे चलकर भारत के सबसे सोच-समझकर बसाए गए शहरों में एक को जन्म देगा।
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1562
मुगलों से वैवाहिक संबंध
राजा भारमल ने अपनी बेटी का विवाह अकबर से कर दिया। इस गठबंधन ने सुरक्षा भी दी और प्रभाव भी। उसी क्षण से कछवाहे केवल स्थानीय सरदार नहीं रहे, बल्कि मुगल व्यवस्था के भीतर बड़े खिलाड़ी बन गए, और आगे चलकर उसी स्थिति का उपयोग उन्होंने अपनी बिल्कुल अलग पहचान गढ़ने में किया।
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1592
आमेर किले का निर्माण शुरू
मान सिंह प्रथम ने उस विशाल महल-समूह का निर्माण शुरू कराया जो आज भी आमेर के ऊपर पहाड़ियों पर छाया हुआ है। पहली शिलाएँ तब रखी गईं जब शासक सम्राट की सेवा में दूर-दराज़ के अभियानों पर था। बाद का हर जयपुर नरेश अपने आपको यहाँ मान सिंह द्वारा बनाई गई विरासत के मुकाबले में तौलता रहा।
जय सिंह की दृष्टि
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1699
सवाई जय सिंह द्वितीय ने गद्दी संभाली
ग्यारह वर्ष की उम्र में जय सिंह आमेर के शासक बने। बालक को तब से ही खगोलशास्त्र और शहरी व्यवस्था का गहरा जुनून था। यही दो आग्रह आगे चलकर उन्हें आमेर की तंग पहाड़ियों को छोड़ मैदानी भाग में एक नई राजधानी बसाने की ओर ले गए।
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1727
जयपुर की स्थापना
18 नवंबर 1727 को सवाई जय सिंह द्वितीय ने अपनी नई राजधानी की नींव रखी। आमेर में पानी की कमी और बढ़ती भीड़ ने यह कदम उठाने पर मजबूर किया। विद्याधर भट्टाचार्य ने ऐसा ग्रिड तैयार किया जो वास्तु सिद्धांतों का पालन करता है, फिर भी लगभग आधुनिक लगता है। यह शहर एक साथ पवित्र आरेख भी था और व्यापार की मशीन भी।
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1728
जंतर मंतर का निर्माण
वेधशाला परिसर में विशाल पत्थर के यंत्र उठने लगे। दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्यघड़ी आज भी ऐसी छाया डालती है जो सटीक समय बताती है। जय सिंह अपने ही आँगन से ब्रह्मांड को मापना चाहते थे। वे इतने सफल हुए कि बाद में यूनेस्को ने इन यंत्रों को जीवित वैज्ञानिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया।
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1734
नाहरगढ़ किला पूरा हुआ
पहाड़ी शिखर पर बना यह किला ठीक समय पर तैयार हुआ ताकि उभरते हुए शहर पर नज़र रख सके। इसकी तोपें और प्राचीर उस उथल-पुथल के खिलाफ बीमा थीं जिसकी आहट सबको सुनाई दे रही थी। इसकी दीवारों से आज भी साफ़ दिखता है कि जय सिंह ने अपनी राजधानी को सुरक्षात्मक पहाड़ियों और खुले व्यापारिक मार्गों के बीच कितनी सोच-समझकर रखा था।
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1743
जय सिंह का निधन
खगोलप्रेमी राजा का निधन उनके अपने नए शहर में हुआ। एक ही पीढ़ी में उन्होंने राजधानी बदली, ऐसी वेधशाला बनाई जो आज भी काम करती है, और ऐसा सड़क-जाल रचा जो तीन सदियों की अव्यवस्था के बाद भी कायम है। बहुत कम शासक शहर की बनावट पर इतना साफ़ निशान छोड़ते हैं।
मराठा दबाव
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1748
बगरू का युद्ध
बगरू में मराठों और आंतरिक प्रतिद्वंद्वियों ने ईश्वरी सिंह की सेना को हरा दिया। इस लड़ाई के साथ आर्थिक क्षरण और राजनीतिक दखल के लंबे दौर की शुरुआत हुई। जयपुर का स्वर्णिम संस्थापक काल उस रणभूमि की धूल में अचानक समाप्त हो गया।
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1750
ईश्वरी सिंह की आत्महत्या
कर्ज़ और हार से टूटकर ईश्वरी सिंह ने अपने प्राण ले लिए। उनके उत्तराधिकारी माधो सिंह प्रथम को मराठा प्रभाव में घिरा राज्य मिला। ईसर लाट आज भी एक अजीब-सा स्मारक बनकर खड़ा है, एक शासक की निराशा की याद दिलाता हुआ।
उत्तरकालीन कछवाहा शासन
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1799
हवा महल का उदय
महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने हवाओं के महल का निर्माण पूरा कराया। इसकी 953 झरोखियाँ राजपरिवार की महिलाओं को बिना दिखे सड़क का जीवन देखने देती थीं। गुलाबी मधुमक्खी-छत्ते जैसी इसकी मुखाकृति जल्दी ही उस शहर की पहचान बन गई जो जितना दिखाता है, उतना ही छिपाता भी है।
ब्रिटिश सर्वोच्चता
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1818
ब्रिटिश सहायक संधि
जयपुर ने ऐसी संधि पर हस्ताक्षर किए जिसने उसे संरक्षित रियासत बना दिया। विदेश नीति पर ब्रिटिश नियंत्रण हो गया, जबकि कछवाहों ने आंतरिक शासन बनाए रखा। इस व्यवस्था ने शहर को सीधे विजय से बचा लिया, लेकिन धीरे-धीरे उसकी स्वतंत्रता को खोखला कर दिया।
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1835
राम सिंह द्वितीय का राज्यारोहण
सुधारवादी महाराजा ने प्रशासन, शिक्षा और पुलिस के आधुनिकीकरण की शुरुआत की। वे भारत के शुरुआती शाही फोटोग्राफरों में भी एक बने। उनके शासन में जयपुर एक साथ अपने राजसी अतीत की ओर देखता रहा और एक नौकरशाही भविष्य की ओर भी बढ़ा।
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1876
शहर गुलाबी हुआ
वेल्स के राजकुमार की यात्रा के लिए राम सिंह ने पुराने शहर की हर इमारत को टेराकोटा गुलाबी रंग से रंगने का आदेश दिया। रंग टिक गया। जो शुरुआत में अस्थायी शाही खुशामद थी, वही आगे चलकर पिंक सिटी की स्थायी पहचान बन गई, एक ऐसा प्रचारक निर्णय जिसने अपने मूल उद्देश्य को भी पीछे छोड़ दिया।
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1887
अल्बर्ट हॉल संग्रहालय खुला
राम निवास बाग में बना इंडो-सरैसेनिक संग्रहालय अंततः जनता के लिए खोल दिया गया। इसकी लघुचित्र, हथियार और कालीनों की संग्रह-संपदा दरबार की भौतिक स्मृति को संजोए रखती है। इमारत स्वयं राजपूत, मुगल और विक्टोरियन संवेदनाओं के सोचे-समझे मेल का उदाहरण है।
स्वतंत्र भारत
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1949
जयपुर राजस्थान में शामिल हुआ
मान सिंह द्वितीय ने विलय-पत्रों पर हस्ताक्षर किए। अंतिम शासक महाराजा नए राज्य के राजप्रमुख बने। जयपुर ने स्वतंत्र राज्य की राजधानी होने का दर्जा खोया, लेकिन राजस्थान की राजधानी के रूप में उसे नया जीवन मिला। महल अब भी परिवार का है, पर शहर अब सबका है।
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1956
राजस्थान ने अंतिम रूप लिया
आधुनिक राजस्थान ने जयपुर को स्थायी राजधानी बनाकर अपनी वर्तमान सीमाएँ ग्रहण कीं। पुरानी रियासती व्यवस्था समाप्त हो गई। फिर भी गुलाबी ग्रिड, पहाड़ियों पर बने किले और सूर्य की चाल नापते यंत्र अपनी शांत गति से वैसे ही काम करते रहे, मानो कुछ बदला ही न हो।
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2008
मई के बम विस्फोट
13 मई को समन्वित धमाकों ने पुराने शहर को झकझोर दिया और साठ से अधिक लोगों की जान ले ली। सदियों के युद्ध झेल चुके बाज़ार और मंदिर अचानक आधुनिक आतंक के सामने खड़े थे। शहर ने शोक मनाया, फिर चुपचाप अपनी सड़कों को सँवारा। यहाँ धैर्य कोई नारा नहीं, बस काम करने का तरीका है।
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2019
परकोटे वाला शहर यूनेस्को सूची में शामिल
जयपुर के पूरे नियोजित ग्रिड को विश्व धरोहर का दर्जा मिला। केवल स्मारकों को नहीं, बल्कि उन सड़कों, चौपड़ों और बाज़ारों को भी जिन्हें जय सिंह और विद्याधर ने रचा था। इस मान्यता ने आखिरकार पूरे शहर को ही उत्कृष्ट कृति माना, केवल उसकी इमारतों को नहीं।