लोदी सल्तनत
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1504
सिकंदर लोदी ने आगरा को फिर बसाया
सिकंदर लोदी ने अपना दरबार दिल्ली से यमुना के इस धूलभरे मोड़ पर ले आया। उसने एक किला बनवाया और पहली ढंग की सड़कों की रूपरेखा तैयार करवाई। कुछ ही वर्षों में बाज़ार के ऊपर घोड़ों के पसीने और नई चिनाई की गंध तैरने लगी। आगरा हाशिये की जगह नहीं रहा, वह आगे की राजधानी बन गया।
मुगलों का आगमन
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1526
पानीपत के बाद बाबर ने आगरा पर अधिकार किया
इब्राहीम लोदी के युद्धभूमि में गिरने के बाद बाबर अप्रैल में घोड़े पर सवार होकर आगरा में दाखिल हुआ। लोदी हरम की स्त्रियों ने कुओं में गहने छिपा दिए। बाबर को यह जगह गर्म और शत्रुतापूर्ण लगी, फिर भी उसने पहला चारबाग़ लगवाया। वही बाग़, जिसे बाद में राम बाग़ कहा गया, आज भी उसकी जल-नहरों को सँभाले हुए है।
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1526
बाबर ने आराम बाग़ बसवाया
बाबर को फ़रगना के बाग़ बहुत याद आते थे। उसने फ़ारसी माली बुलाकर यमुना के किनारे एक एकदम संतुलित आयताकार बाग़ कटवाया। भारत का पहला मुगल बाग़ उसकी सीधी निगरानी में आकार लेने लगा। चार सदियों बाद भी उसके फव्वारे उसी ज्यामिति की फुसफुसाहट करते हैं।
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1530
आगरा किले में हुमायूँ का राज्याभिषेक हुआ
हुमायूँ को पुरानी लोदी किलेबंदी के भीतर तलवार और उपाधि सौंपी गई। समारोह में गुलाबजल और घबराहट भरे पसीने की मिली-जुली गंध थी। आगरा थोड़े समय के लिए एक डगमगाते साम्राज्य का औपचारिक हृदय बन गया। यह ज़्यादा दिन शांत नहीं रहने वाला था।
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1556
हेमू ने आगरा पर कब्ज़ा किया
हिंदू सेनापति हेमू फाटक तोड़ते हुए भीतर घुसा और दिल्ली की ओर बढ़ने से पहले आगरा पर अधिकार कर लिया। कुछ महीनों तक यह शहर न मुगलों का रहा, न लोदियों का। फिर पानीपत का दूसरा युद्ध हुआ। हेमू का कटा हुआ सिर इस प्रयोग का अंत बन गया।
अकबर का शासनकाल
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1565
अकबर ने आगरा किले का पुनर्निर्माण कराया
अकबर ने पुराने ईंटों के किले को गिरवाकर 21 मीटर ऊँची लाल बलुआ पत्थर की दीवारें उठवाईं। हाथियों ने विशाल पत्थर खींचे। इस नए दुर्ग में उन महलों, मस्जिदों और हरमों के लिए जगह थी जिनके लिए अब काबुल से बंगाल तक फैला साम्राज्य चाहिए था। आज भी आप उसके चुने हुए गरम बलुआ पत्थर पर हाथ फेर सकते हैं।
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1571
अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी बसाया
चालीस किलोमीटर पश्चिम में अकबर ने सलीम चिश्ती की दरगाह के इर्द-गिर्द लाल पत्थर का पूरा शहर बसाया। चौदह वर्षों तक दरबार आगरा और इस नई राजधानी के बीच चलता रहा। फिर पानी कम पड़ गया। महल लगभग रातोंरात खाली हो गए।
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1605
अकबर की मृत्यु आगरा में हुई
पचास वर्ष तक शासन करने वाला सम्राट अपने किले के भीतर चुपचाप चला गया। उसका पार्थिव शरीर सिकंदरा ले जाया गया, जहाँ मज़दूर उसके विशाल मकबरे पर काम शुरू कर चुके थे। उसका स्वप्न देखकर बढ़ा यह शहर अचानक बिना दिशा का लगने लगा।
जहाँगीर और नूरजहाँ
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1623
नूरजहाँ ने एतमाद-उद-दौला बनवाया
नूरजहाँ ने अपने पिता के लिए ऐसा मकबरा बनवाया जिसमें लाल बलुआ पत्थर की जगह सफेद संगमरमर और पिएत्रा ड्यूरा का काम था। नदी किनारे “बेबी ताज” जैसे एक झटके में उभर आया। पहली बार आगरा ने देखा कि सुबह की रोशनी में संगमरमर कितना दमक सकता है।
शाहजहाँ का दौर
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1631
मुमताज़ महल की मृत्यु, ताज का निर्माण आदेशित
मुमताज़ की मृत्यु बुरहानपुर में प्रसव के दौरान हुई। शाहजहाँ का शोक नाटकीय भी था और पूर्ण भी। उसने वास्तुकारों को आगरा बुलाया और ऐसा मकबरा बनाने का आदेश दिया जैसा पहले कभी न देखा गया हो। बीस हज़ार कारीगर उस सफेद संगमरमर को आकार देने लगे जो आज भी पहली बार आने वाले हर यात्री की साँस थाम देता है।
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1643
जहाँआरा ने आगरा की जामा मस्जिद बनवाई
शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा ने किले के पास एक मस्जिद पर पाँच लाख रुपये खर्च किए। लाल बलुआ पत्थर का उसका आँगन आज भी शाम की नमाज़ की आवाज़ से भर उठता है। उसने कभी इस पर अपना नाम नहीं लिखवाया। इमारत ही उसका पर्याप्त हस्ताक्षर है।
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1648
ताज महल मूलतः पूरा हुआ
सत्रह वर्षों बाद मुख्य मकबरा तैयार खड़ा था। संगमरमर मकराना से आया था, रत्न बगदाद तक से। शाहजहाँ आखिरकार उस स्मारक को देख सका जिसे उसने अपने शोक में कल्पना किया था। उसे यह मालूम नहीं था कि जल्द ही वही इसे केवल कैद की खिड़की से देख पाएगा।
औरंगज़ेब का दौर
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1658
औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को क़ैद किया
औरंगज़ेब ने सत्ता छीन ली और अपने पिता को आगरा किले में बंद कर दिया। आठ वर्षों तक बूढ़ा सम्राट संगमरमर की गलियों में चलता रहा और नदी के पार ताज को देखता रहा। उसकी मृत्यु 1666 में वहीं हुई। शहर ने देखा कि एक बेटे ने अपने पिता को उसी इमारत में दफ़नाया जो उस पिता ने अपनी पत्नी के लिए बनवाई थी।
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1666
शिवाजी आगरा से निकल भागे
मराठा राजा को शाही आश्वासन के साथ दरबार में बुलाया गया और तुरंत नज़रबंद कर दिया गया। 17 अगस्त को वह मिठाइयों की टोकरी में छिपकर पहरेदारों की आँख बचाकर निकल गया। यह भाग निकलना पूरे दक्कन में कथा बन गया। आगरा ने सीखा कि मुगल राजधानी को भी मात दी जा सकती है।
बाद का मुगल पतन
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1735
नज़ीर अकबराबादी का जन्म
वह कवि, जो बाद में खुद को “अकबराबाद का” कहेगा, इन भीड़भरी गलियों में जन्मा। जब सम्राट उठते और गिरते रहे, नज़ीर ने फेरीवालों, बरसातों और साधारण दुखों पर लिखा। उसकी पंक्तियाँ आज भी ऐसे सुनाई देती हैं जैसे शहर खुद बोल रहा हो।
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1761
जाटों ने आगरा किले पर कब्ज़ा किया
सूरज मल की जाट सेना ने चालीस दिनों तक किले की घेराबंदी की। उसके गिरते ही आगरा में मुगल स्वप्न का प्रभावी अंत हो गया। लुटेरे वह सब उठा ले गए जो पहले के युद्ध छोड़ गए थे। जिन लाल दीवारों ने कभी बादशाहों को पनाह दी थी, वे अब लुटेरों के अलावों की आड़ बन गईं।
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1797
काला महल में ग़ालिब का जन्म
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ने आगरा के एक संकरे घर में पहली साँस ली। शहर की नफ़ीस उर्दू ने उसकी ज़बान को हमेशा के लिए ढाल दिया। बाद में वह दिल्ली चला गया, फिर भी काला महल का यह लड़का आगरा की ढलती उम्र वाली उदासी कभी पूरी तरह नहीं छोड़ पाया।
ब्रिटिश काल
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1803
ब्रिटिशों ने आगरा पर कब्ज़ा किया
लॉर्ड लेक की सेना ने मराठों को पराजित किया। 30 दिसंबर को हुई सूरजी-अंजनगाँव की संधि ने आगरा को ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया। एक नई नौकरशाही मुगल महलों में आ बसी। सुबह की अज़ान की पुकार की जगह मार्च करते जूतों की आवाज़ ने ले ली।
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1857
विद्रोह के दौरान आगरा की लड़ाई
अक्टूबर में बाग़ी सिपाहियों और ब्रिटिश सैनिकों की भिड़ंत शहर और छावनी की सड़कों पर हुई। किला यूरोपियों की शरणस्थली बन गया। जब धुआँ छँटा, शहर थककर चूर पड़ा था। विद्रोह यहाँ असफल रहा, लेकिन उसकी स्मृति इन तंग गलियों से कभी नहीं गई।
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1861
मोतीलाल नेहरू का जन्म
कांग्रेस के भावी अध्यक्ष और एक प्रधानमंत्री के पिता ने पहली बार आगरा के एक घर में रोकर जीवन का संकेत दिया। शहर की विधिक संस्कृति और ब्रिटिश सत्ता के साथ उसका असहज रिश्ता उनके शुरुआती वर्षों को आकार देता रहा। नेहरू परिवार बाद में चला गया, लेकिन आगरा आज भी इस संबंध को अपना मानता है।
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1927
आगरा विश्वविद्यालय की स्थापना
1 जुलाई को विश्वविद्यालय ने अपने द्वार खोले। उत्तर भारत भर से छात्र ताज की छाया में पढ़ने आए। यह संस्थान चुपचाप राष्ट्रवादी विचारों का केंद्र बनने लगा, जबकि ब्रिटिश सत्ता अब भी निगाह रखे हुए थी।
स्वतंत्र भारत
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1947
स्वतंत्रता और विभाजन
आगरा ने आधी रात का वह क्षण मिले-जुले भावों के साथ देखा। कुछ परिवार पाकिस्तान चले गए, कुछ यहीं रहे। चमड़े की कार्यशालाएँ और संगमरमर जड़ाई के अटेलियर नए झंडों के नीचे भी चलते रहे। स्मारक वैसे ही रहे, मानवीय सीमाओं से उदासीन।
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1983
ताज और आगरा किला यूनेस्को स्थलों में शामिल हुए
दुनिया ने आधिकारिक रूप से ताज और किले को संरक्षित धरोहर घोषित किया। संरक्षणकर्मी, राजनेता और पर्यटन व्यवसायी अचानक एक ही भाषा बोलने लगे। संगमरमर की नियमित जाँच शुरू हुई। फिर भी प्रदूषण बढ़ता ही रहा।
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1996
ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन स्थापित हुआ
सर्वोच्च न्यायालय ने स्मारकों के चारों ओर 10,400 वर्ग किलोमीटर का संरक्षित घेरा खींच दिया। उद्योगों को ईंधन बदलना पड़ा या बंद होना पड़ा। हवा धीरे-धीरे बेहतर हुई। शहर ने सीखा कि उसका सबसे मशहूर निवासी सबसे अधिक त्याग भी माँगता है।
flight
2012
यमुना एक्सप्रेसवे खुला
165 किलोमीटर लंबे राजमार्ग ने दिल्ली तक की यात्रा का समय बहुत घटा दिया। अब गाड़ियाँ पुराने कारवाँ मार्गों के पास से चीखती हुई निकल जाती हैं। आगरा के चमड़े के जूते और संगमरमर की स्मृतिचिह्न पहले से तेज़ बाज़ारों तक पहुँचते हैं। शहर राजधानी के और करीब लगता है, फिर भी किसी तरह अपने अतीत से और दूर।
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2023
आगरा के चमड़े के फुटवियर को जीआई टैग मिला
शहर की पारंपरिक जुत्तियों को आखिरकार उनके मूल की कानूनी पहचान मिल गई। जो कारीगर कभी ताज की छाया में काम करते थे, अब उनके पास यह साबित करने के कागज़ भी हैं कि उनकी कला मायने रखती है। पुराने शहर में हर सुबह अब भी कमाए हुए चमड़े की गंध तैरती है।
flight
2024
आगरा मेट्रो ने सेवा शुरू की
मार्च में पहली मेट्रो लाइन खुली, जो ताज महल और आगरा किले के पास से फिसलती हुई निकलती है। अब यात्री उन्हीं सड़कों के ऊपर से सफर करते हैं जहाँ कभी हाथी बादशाहों को ढोते थे। जिस शहर ने दुनिया का सबसे मशहूर मकबरा बनाया, वही अब अपने लोगों को ज़मीन के नीचे और ऊपर दोनों रास्तों से चलाता है।